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राजस्थान के लोक गीत एवं नृत्य by Innoza IT Center Udaipur
राजस्थान के लोक गीत एवं नृत्य | Rajasthan GK
July 4, 2017
राजस्थान के संग्रहालय by Innoza IT Center Udaipur
राजस्थान के संग्रहालय | Rajasthan GK
July 4, 2017

राजस्थान के लोक वाधयंत्र | Rajasthan GK

राजस्थान के लोक वाधयंत्र by Innoza IT Center Udaipur
  1. तत् वाघ यंत्र : जिन वाघ यंत्रो में तारो से स्वरों के उत्पत्ती होती है वै तंतु या तत् वाघ यंत्र  कहलाते है, जैसे सारंगी , इसराज आदी
  2. सारंगी : यह सर्वश्रेष्ठ वाघ यंत्र है, यह सागवान की लकड़ी की बनायी जाती है ईसके तार बकरे की आंत के बनाते है व गज में घोड़े की पूंछ के बाल बंधे होते है।
  3. इकतारा :  इसे आदि वाघ माना गया है इसका समंध नारद जी से जोड़ा जाता है।
  4. रावणहत्था  : यह राजस्थान का प्रमुख वाघ यंत्र है, यह  नारियल के खोल पर बकरे की खाल  चडाकर बनाया जाता है।
  5. कामायचा  : यह सारंगी के समान होता है।
  6. भपंग  : अलवर जिले के जोगी जाती के लोग भपंग वाघ यंत्र के साथ लोकगाथाए गाते है, यह  डमरू के जैसा होता है।
  7. तंदूरा : इसे वेणा भी कहते इसमे चार तार होते है, इसे अंगुलियों में मिजराब पहनकर बजाया जाता है।
  8. रबाज : यह कामयाचाचे की तरह होता है, लेकिन इसमे गज काम में नहीं लाई जाती है।
  9. चिकारा :  ईसमे तीन तार होते है, यह प्याले की आकार का होता है, यह छोटी गज की सहायता से बजाया जाता है।
  10. गुज़री : यह रावणहत्था से छोटा उसी के जैसा होता है, इसमे पांच तार ही होते है।
  11. सुरिंदा  : यह सतारा एवं मुरला की सांगत में बजाया जाता है।
  12. दुकाको : यह भील समुदाय द्वारा दीवाली पर बजाया जाता है।
  1. सुषिर वाघ यंत्र : जो यंत्र फुक कर बजाये जाते उन्हें सुषिर वाघ यंत्र कहते है।
  2. बाँसुरी : बांस की पोली नली में सात छेद करके ईसे बनाते है।
  3. अलगोजा : यह नकसासी से बजता है, इसमे चार छेद वाली दो बांसुरी होती है।
  4. शहनाई : यह मांगलिक वाघ यंत्र है, यह ज्यादा शादियों में बजाया जाता है।
  5. पुंगी  : यह छोटी लोकी के तुम्बे की बनी होती है, इसमे साँप को मोहित करने की ध्वनी होती है।
  6. मशक : इसकी आवाज पुंगी की तरह होती है, यह बकरी के चमड़े की बनी हुई होती है. इसे नकसासी की सहायता से बजाते है।
  7. बाँकिया  : यह  पित्तल का बना हुआ होता है , इसके साथ ढोल व कांसी की थाली बजायी जाती है, यह शादीयों में ज्यादातर बजाया जाता है।
  8. भुंगल  : यह खेल के शुरू होने से पहले लोगो को इक्कट्ठा करने के लिए बजाया जाता है।
  9. नड  : मरू प्रदेश का वाघ यंत्र है यह 1मीटर लंबी प्राकृतिक लकड़ी से बनाया जाता है।
  10. मोरचंग  : यह लोहे का बना होता है, इसे होठो के बिच रखकर बजाया जाता है।
  11. करणा  : यह पित्तल का बना हुआ होता है, यह राज दरबारो में बजाया जाता है।
  12. नागफनी : यह मंदिरों में साधू संत बजाते है, जो पित्तल की नाली के आकार का होता है।
  13. सींगा  : इसे साधू संत ही बजाते है जो धनुषाकार पित्तल की नली का बना हुआ होता है।
  14. सींघी  : यह हिरन , बारहसिंगा , भैसे के सिंग से बनाया जाता है जोघी इसे बजाते है।
  15. सुरनाई  :  यह शहनाई के सामान होता है यह मांगलिक वाघ है।
  16. अवनद्ध या ताल वाघ यंत्र : चमड़े से मढ़े हुए वाघ यंत्र आते है।
  17. मृदंग/पखावज : यह वाघ बीजा, सवन, सुपारी, और बड के पेड़ के तने से बनते है।
  1. ढोलक :  यह सागवान, बीजा, शीशम, नीम, सवन, सुपारी के बनाते है यह प्राचीन काल  से बजाया जाने वाला प्राचीन वाघ  यंत्र भी है।
  2. ढोल  : यह लोहे का बना हुआ होता है, इसपे चमडा चडाकर रस्सी से कंसकर बंध के बनाया जाता है, यह मांगलिक वाघ है, होली व विशेष उत्सव  में बजाते है।
  3. नगाड़ा : यह सुपारी के आकार का होता है, यह शहनाई के साथ भी बजाया जाता है।
  4. नौबत : यह अंडाकार कुंडी  के आकार का होता है जिसे भैसे की खाल से मंड कर बनाते है, इसे मंदिरों व  राजाओ महाराजो के महल के मुख्य दरवाजे पर होता है।
  5. मांदल : यह मृदंग के आकर का मिट्टी सी बना होता है, इसे भील गवरी नृत्य में बजाते है।
  6. चंग  :  इसे शेखावाटी क्षेत्र में ज्यादा बाजाते है, यह लकड़ी का बना हुआ होता है।
  7. डैरु   : यह डमरू के आकर का होता है, इसे आम की लकड़ी से बनाते है।
  8. खंजरी  : इसे ज्यादातर भजन करने वाले ज्यादा बजाते है।
  9. धौंसा   : इसे दुर्ग या बड़े मंदिरों में डंडे से बजाया जाता है।
  10. तासा  : यह मुस्लिम समुदाय के लोग ज्यादा बजाते है, यह मिट्टी या लोहे से बना होता है।
  11. दमादा (टामक) : यह युद्ध में खाशकर बजाया जाता था, यह बड़े आकार की कढाई के आकार का होता है, जिसे भैसे की खाल से मंड कर बनाया जाता था।
  12. घेरा  : यह डफ के समान होता है जो अष्टभुजाकार होता है, जिसे एक तरफ चमडा मंड कर बनाया जाता है।
  13. डफ   : इसे लोहे के गोल घेरे को बकरे की खाल से मंड कर बानाया जाता है।
  14. ढाक  : इसे गुजर जाती के लोग गोठा गाते समय पैरो पर रखकर बजाते है।
  15. कुंडी  : यह सिरोही के क्षेत्र गरासियो व मेवाड़ के जोगीयो का प्रमुख वाघ है।
  16. पाबुजी के माटे  : माटो पर थोरी या नायक जाती के लोग पाबुजी के पावडे गाते हुए इसे बजाते है, यह दो (नर-मादा) होते है, जिसे दो अलग-अलग व्यक्ति मिलकर बजाते है।
  17. कमर : यह अलवर, भरतपुर क्षेत्र में जिसे 3-4 व्यक्ति मिलकर बजाते है, यह लोहे की गोल  चद्दर पर चमडा मंड कर बनाया जाता है।
  18. माठ : पाबुजी के पावडो के गायां के साथ बजाया जाता है।
  19. घन वाघ यंत्र : जिन वाघ यंत्र में चोट या आघात से स्वर उत्पन्न होते है वे घन वाघ यंत्र कहलाते है।
  20. मंजीरा :  यह गोलाकार पित्तल व कांसे का बना हुआ होता है,  इसे जोड़े में बजाया जाता है।
  21. थाली  : यह थाली होती है जो कांसे की बनी होती है, इसे ज्यादा कालबेलिया जाती की       महिलाए बजाती है।
  22. झांझ  : यह शेखावाटी क्षेत्र में कच्छी घोडी नृत्य में इसको बजाते है, यह मंजीरे जैसा है ।
  23. करताल :  यह साधू संतो के भजन कीर्तन में काम आने वाला वाघ यंत्र है जिसे हाथ की अंगुलियों में पहनकर बजाते है ।
  24. घंटा  :  यह पीतल या अन्य धातु का बना हुआ होता है जिसके अन्दर की तरफ एक डंडा लटका रहता है जिसे चोट करके बजाया जाता है ।
  25. चिमटा  : यह  चिमटे जैसा लोहे की दो पट्टियों से बना होता है जिसके अन्दर और पत्तिया भी लगी हुई होती है, जिसे हाथो से पकड़कर बजाते है ।
  26. भरनी  : यह अलवर भरतपुर में साँप के काटने पर लोक देवताओ के यहाँ इलाज करते समय बजाया जाता है, इसे मिट्टी की मटकी के मुह पर कांसे की  प्लेट लगाकर बनाया जाता है।
  27. झालर : यह तांबे या कांसे की बनी हुयी होती है जिसे मंदिरों में आरती करते समय बजाते है।
  28. घड़ा : इसे बाड़मेर-जैसलमेर में भक्ति के संगीत गाते समय बजाते है, यह घड़े के आकर का छोटा मुह वाला होता है जिसके अन्दर फुक मारकर वादक अपने अनुसार बजाता है।
  29. घुंगरु  :  यह महिलाए नृत्य करते समय पैरो में  बांधती है जो पीतल या कांसे के बने गोल अंडाकार जिसमे छर्रे होते है।
  30. गरासियो की लेजिम : यह गरासियो भीलो की ओरते होली या उत्सव पर नाचते समय हाथ में पकड़कर बजाते हुए नाचती है यह बांस के डंडे पर पत्तिया लगी हुयी होती है।

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